फेफड़ों का कैंसर महिलाओं में क्यों हो रहा है कैंसर का बढ़ता खतरा जानते है इसका इलाज और बचाव क्या है
आपने कभी सोचा है कि बार-बार की खांसी या थकान कहीं किसी गंभीर बीमारी का संकेत तो नहीं? भारत में महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसकी पहचान अक्सर देर से होती है। इस लेख में हम बताएंगे कि ऐसा क्यों होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है।
NCRP डेटा से चौंकाने वाले तथ्य
2012–2016 के बीच नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम (NCRP) के मुताबिक, महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर टॉप 5 कैंसर में शामिल है। यह 6.2% कैंसर मामलों का हिस्सा है।
फेफड़ों का कैंसर महिलाओं में क्यों होता है नजरअंदाज?
कई डॉक्टर यह मान लेते हैं कि महिलाएं, खासकर गैर-धूम्रपान करने वाली, फेफड़ों के कैंसर से सुरक्षित हैं। यही सोच गलत डायग्नोसिस का कारण बनती है।
भारतीय महिलाएं अक्सर अपने परिवार की देखभाल में लगी रहती हैं और अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देती हैं।

लक्षण जो अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं
थकावट, खांसी, पीठ दर्द – आम पर गंभीर संकेत – ऐसे लक्षणों को लोग अक्सर एलर्जी, अस्थमा या थकावट मान लेते हैं, जबकि ये फेफड़ों के कैंसर के संकेत हो सकते हैं।
महिलाओं में खास लक्षण – कंधे का दर्द और आवाज में बदलाव – पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अलग तरह के लक्षण देखे जाते हैं जैसे कंधे में दर्द या आवाज में भारीपन।
धूम्रपान न करने वाली महिलाओं में भी फेफड़ों का कैंसर?
एक स्टडी के अनुसार, 2/3 महिलाओं ने कभी धूम्रपान नहीं किया था फिर भी उन्हें कैंसर हुआ।
पर्यावरणीय कारण – प्रदूषण, बायोमास ईंधन, सेकंड हैंड स्मोक
भारत में किचन का धुआं, लकड़ी या गोबर के उपले जलाने से निकलने वाला धुआं और वायु प्रदूषण फेफड़ों के कैंसर के मुख्य कारण बनते जा रहे हैं।
कैंसर के प्रकार और महिलाओं में आम टाइप
एडिनोकार्सिनोमा का प्रकोप – यह कैंसर का सबसे आम प्रकार है जो महिलाओं, खासकर गैर-धूम्रपान करने वालों में पाया जाता है।
EGFR म्यूटेशन और टार्गेटेड थेरेपी की भूमिका – EGFR म्यूटेशन वाले कैंसर का इलाज EGFR टायरोसीन किनेस इनहिबिटर्स से किया जाता है, जो कीमोथैरेपी से कहीं ज्यादा असरदार हो सकते हैं।
महिलाओं और पुरुषों के बीच जैविक अंतर
ट्यूमर के प्रकार में अंतर – महिलाएं ज़्यादा तर एडिनोकार्सिनोमा से ग्रसित होती हैं, जबकि पुरुषों में स्क्वैमस सेल या स्मॉल सेल टाइप ज्यादा होता है।
इलाज में फर्क – टार्गेटेड थेरेपी बनाम कीमोथैरेपी
गैर-धूम्रपान करने वाली महिलाएं टार्गेटेड थेरेपी के प्रति ज्यादा रिस्पॉन्सिव होती हैं।
देर से डायग्नोसिस क्यों होता है?
लक्षणों की गलत पहचान – खांसी या थकावट को बहुत देर तक नजरअंदाज करना इलाज में देरी की वजह बनता है।
हेल्थकेयर सिस्टम में लैंगिक असमानता – महिलाओं की समस्याओं को कई बार गंभीरता से नहीं लिया जाता, खासकर जब वे धूम्रपान नहीं करतीं।
महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की जरूरत
नियमित चेकअप और मेडिकल हिस्ट्री – हर महिला को साल में कम से कम एक बार मेडिकल चेकअप जरूर करवाना चाहिए।
खुद को नजरअंदाज करना बंद करें – “पहले घर, बाद में खुद” की सोच अब बदलनी होगी।

डॉक्टर से कब मिलें?
- खांसी 3 हफ्तों से ज्यादा हो?
- अगर खांसी लंबे समय तक बनी रहे, तो बिना देर किए डॉक्टर से मिलें।
- सांस लेने में दिक्कत, सीने या पीठ में दर्द?
- यह लक्षण गंभीर हो सकते हैं। इन्हें नजरअंदाज न करें।
महिलाओं के लिए ज़रूरी सलाह
- हर खांसी को हल्के में न लें
- थकावट और सांस फूलना को नजरअंदाज न करें
- खुद को परिवार के बराबर प्राथमिकता दें
निष्कर्ष
महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर एक साइलेंट किलर की तरह है – नजरों के सामने होते हुए भी अक्सर छूट जाता है। जागरूकता, समय पर जांच, और सही इलाज से इसे हराया जा सकता है। चाहे आप धूम्रपान करती हों या नहीं, अगर लक्षण दिखें तो देर न करें। अपने जीवन को प्राथमिकता दें – क्योंकि आपकी सेहत ही आपके परिवार की ताकत है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
- क्या गैर-धूम्रपान करने वाली महिला को भी फेफड़ों का कैंसर हो सकता है?
हाँ, भारत में 2/3 महिला मरीज धूम्रपान नहीं करतीं। - फेफड़ों के कैंसर के सबसे आम लक्षण क्या हैं?
लंबे समय तक खांसी, सांस फूलना, थकान, और पीठ या कंधे में दर्द। - महिलाओं में कौन सा टाइप सबसे ज्यादा होता है?
एडिनोकार्सिनोमा, खासकर गैर-धूम्रपान करने वाली महिलाओं में। - इलाज में कौन-कौन सी तकनीकें उपयोग होती हैं?
टार्गेटेड थेरेपी, कीमोथैरेपी, और इम्यूनोथैरेपी। - फेफड़ों के कैंसर से बचने के उपाय क्या हैं?
प्रदूषण से बचाव, घर में वेंटिलेशन, नियमित चेकअप और समय पर जांच।