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भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 का प्रभाव

भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 का प्रभाव न केवल आर्थिक विकास दर में गिरावट के रूप में दिखा, बल्कि रोजगार, व्यापार और सामाजिक असमानता पर भी इसका गहरा असर पड़ा।”

 

कोविड-19 महामारी से भारत को बहुत बड़ा नुकसान पंहुचा था  प्रमुख रूप से २०२१ में वायरस की दूसरी लहर ने बहुत बड़ा कोहराम मचाया देश के अर्थववस्था को काफी नुकसान हुआ था सकल घरेलू उत्पाद में तीव्र गिरावट देश के इतिहास में सबसे बड़ी है कुछ गरीब परिवारों ने आर्थिक क्षति को करीब से देखा है

अप्रैल से जून 2020 तक भारत की जीडीपी में 24.4% की भारी गिरावट आई। हालिया राष्ट्रीय आय अनुमानों के अनुसार, 2020/21 वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई से सितंबर 2020) में अर्थव्यवस्था में 7.4% की और गिरावट आई थी तीसरी और चौथी तिमाही (अक्टूबर 2020 से मार्च 2021) में सुधार अभी भी कमजोर रहा जिसमें जीडीपी में 0.5% और 1.6% की वृद्धि हुई। और घटाव की कुल दर (वास्तव में) पूरे 2020/21 वित्तीय वर्ष के लिए 7.3% थी।

भारतीय अर्थव्यवस्था स्वतंत्रता के बाद अवधि में भारत की राष्ट्रीय आय 2020 से पहले केवल चार बार घाटी 1958, 1966 ,1973 और 1980 में जिसमें से  सबसे बड़ी गिरावट 1980 में हुई थी यह 5.2% थी इसका मतलब 2020-21 देश के इतिहास में आर्थिक संगठनों में सबसे खराब वर्ष रहा।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 का प्रभाव

भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 का पर क्या असर पड़ा

कोविड-19 से दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को काफी नुकसान हुआ था लेकिन भारत की सबसे बड़े कमी का सामना करना पड़ा 2020-21 वित्तीय वर्ष के दौरान दुनिया के लिए जीडीपी में गिरावट कि दर  3.3% थी और उभरते बाजार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं 2.2% थी भारत के प्रमुख व्यापक आर्थिक सूचकों का सारांश दिया है और देशों और दुनिया के सामाजिक समूह को भी दर्शाया गया है  अगर ध्यान से देखें तो 2019 में भारत की विकास दर सबसे अधिक थी जो कोविड-19 के कारण यह गिरावट को और भी अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। 2020 में राष्ट्रीय बेरोजगारी दरों की तुलना करें तो भारत की दर 7.1 % थी अगर पिछले वर्षों के मुकाबले  एक खराब प्रदर्शन दर्शाती है

महंगाई दर भी बढ़  रही थी और प्रति व्यक्ति आय कम होती जा रही थी जिसे अर्थव्यवस्था में गिरावट बढ़ती जा रही थी बेरोजगारी भी अपने चरम सीमा पर पहुंच रही थी लोगों के लिए श्रम बाजार भी कम हो गई थे

कोविड-19 की महामारी जितनी बड़ी थी बजट उतना ही काम था भारत ने सामाजिक सुरक्षा के लिए जो भी बजट रखा वह दूसरे देशों के मुकाबले बहुत ही कम मापा गया भारत गैर-स्वास्थ्य क्षेत्र में अन्य देशों के करीब तो लग सकता है लेकिन स्वास्थ्य के लिए जो भी अतिरिक्त पैसे खर्च हुए वह कई अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम थे सबसे बड़ी चिंता की बात यह है थी कि 2021 के बजट में सरकार ने इन मदद के लिए जो पैसे दिए थे  उनमें कोई बढ़ोतरी नहीं की गई खासकर जब महंगाई मुद्रास्फीति को भी ध्यान में रखते हैं खासकर जब महंगाई की मार आम जनता पर पड़ रही थी

भारत में कोविड-19 महामारी का आय, खर्च, गरीबी और बेरोजगारी पर क्या प्रभाव पड़ा है?”

भारत में अमीर और गरीब गरीब के बीच की दूरी बढ़ रही थी 2020 और 21 में देश की संपत्ति का लगभग आधा हिस्सा सिर्फ एक 1% अमीर लोगों के पास था जबकि गरीब लोगों के पास बहुत ही काम संपत्ति थी और महामारी के बाद गरीब लोगों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ गई थी और मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या एक तिहाई कम हो गई थी अप्रैल और मई 2020 के बीच भारत के पहले राष्ट्रीय लॉकडाउन के दौरान, व्यक्तिगत आय में लगभग 40% की गिरावट आई। और देश के सबसे गरीब परिवारों की तीन महीने की कमाई में कमी आई है। (अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, 2021 ; बेयर एट अल, 2021 )। भारत में सबसे बड़े निजी सर्वेक्षण, CMIE के ‘उपभोक्ता पिरामिड घरेलू सर्वेक्षण’ (CPHS) के माइक्रोडेटा से पता चलता है कि प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय में सकल घरेलू उत्पाद से अधिक की गिरावट आई है, पहले लॉकडाउन (अगस्त 2019 की तुलना में अगस्त 2020 में) के बाद औसत प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय 20% से अधिक कम रहा, और 2020 के अंत तक साल-दर-साल 15% कम रहा।

महामारी की पहली लहर के परिणाम को देखते हुए भारत में लगभग 230 मिलियन लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए और यह प्रतिशत दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा था ( अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, 2021 )। गरीब लोगों का प्रतिशत एक साल के भीतर 32% से बढ़कर 60% हो गया। यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ

शहर के इलाकों में रहने वाले लोगों का खर्च ज्यादा होने की वजह से वहां की गरीबी रेखा भी बढ़ती चली गई महामारी से पहले शहरी इलाकों लाखों में दूसरी सबसे गरीब आया श्रेणी 72 % लोग इस गरीबी रेखा से नीचे थे और सिर्फ एक साल में ऐसे लोग भी गरीबों में शामिल हो गए जिनकी आमदनी पहले ज्यादा थी पहले लॉकडाउन के बाद भारत में गरीबी दर बहुत तेजी से बढ़ी और कई सर्वेक्षणों में भी इस संकट को गंभीरता से  दिखाया है और शहरी बेरोजगारी भी काफी बढ़ गई थी अप्रैल से जून 2019 में यह 8.8% थी जो अगले साल 2020 में इसी अवधि में बढ़कर 20.8 % हो गई(राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, भारत सरकार, 2020)।

सूची 3:  2019 से 2020 के बीच, औसत खर्च वाले लोगों में से गरीबी में कितने              लोग थे।”

 

अखिल भारतीय

अखिल भारतीय

शहरी

शहरी

ग्रामीण

ग्रामीण

पंचमक

19 अगस्त

20 अगस्त

19 अगस्त

20 अगस्त

19 अगस्त

20 अगस्त

2

32

60

72

73

33

58

3

14

41

0

50

0

34

4

0

25

0

29

0

16

स्रोत: अगस्त 2019 और अगस्त 2020 के लिए उपभोक्ता पिरामिड घरेलू सर्वेक्षण (CPHS)।

कोविड-19 से कई लोगों को आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा खासकर युवाओं को जो बेरोजगार थे उनके लिए कोई काम नहीं मिला भारत में ज़्यादातर युवा कामकाजी थे मगर किसी का काम छूट गया या उनका रोजगार छिन गया इससे उनकी भविष्य की आमदनी और करियर पर बुरा प्रभाव पड़ा बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्यों में युवा कामगार लंबे समय तक बेरोजगार रहे हैं पहली लहर के बाद आर्थिक सुधार इतनी धीमी थी कि कई युवा भारतीयों को दोबारा काम नहीं मिल सका। गांव लौटे प्रवासी मजदूर शहरों में दोबारा काम करने जाने से पहले ही हिचकिचा रहे थे फिर दूसरी लहर, जो फरवरी के बीच में शुरू हुई और जून 2021 तक चली, ने स्थिति और बिगाड़ दी और काम न मिलने की समस्या को और लंबा कर दिया, जिससे बेरोजगारी का खतरा बढ़ गया।

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