sandhya shantaram का 94 साल की उम्र में निधन। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से मशहूर संध्या को बॉलीवुड में दीर्घकालीन याद किया जाएगा।
संध्या शंकरराव शंतराम: बॉलीवुड की अद्भुत अभिनेत्री को याद करते हुए
भारतीय सिनेमा जगत ने एक और रत्न खो दिया। दिग्गज अभिनेत्री संध्या शंकरराव शंतराम (Sandhya Shantaram) का हाल ही में 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।
वे न सिर्फ एक प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं, बल्कि महान फिल्ममेकर वी. शंतराम की पत्नी भी थीं।
उनकी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को नया आयाम दिया और नृत्य, अभिनय और भावनाओं का संगम दिखाया।

शुरुआती जीवन और फिल्मी सफर की शुरुआत
संध्या का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था। उनका पूरा नाम विजया देसाई था, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने “संध्या” नाम से पहचान बनाई।
उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ जब निर्देशक वी. शंतराम ने उनकी प्रतिभा को पहचाना।
संध्या ने अपनी शुरुआती फिल्मों से ही दर्शकों को अपने अभिनय और नृत्य से प्रभावित किया।
उनकी पहली बड़ी सफलता आई फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” (1955) से, जिसने उन्हें सुपरस्टार बना दिया।
यह फिल्म नृत्य, संगीत और रंगों का अद्भुत मेल थी और उस दौर की सबसे बड़ी हिट साबित हुई।
वी. शंतराम और संध्या: एक अद्भुत जोड़ी
संध्या और वी. शंतराम की जोड़ी सिर्फ निजी जीवन में ही नहीं, बल्कि फिल्मों में भी बेहद सफल रही।
दोनों ने मिलकर भारतीय सिनेमा को कई ऐतिहासिक फिल्में दीं।
उनकी जोड़ी ने ‘दो आंखें बारह हाथ’, ‘नवरंग’, ‘जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली’, और ‘पिंजरा’ जैसी यादगार फिल्में बनाईं।
इन फिल्मों में संध्या ने अपनी अदाकारी से दर्शकों का दिल जीत लिया।
उनका नृत्य भावनाओं को ऐसे व्यक्त करता था कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
1972 में रिलीज हुई फिल्म “पिंजरा” संध्या के करियर की आखिरी बड़ी सफलता रही।
यह एक मराठी फिल्म थी जिसे बाद में हिंदी में भी डब किया गया।
फिल्म का विषय समाज और नैतिकता पर आधारित था, जिसमें संध्या ने एक लावणी नर्तकी का किरदार निभाया था।
उनका अभिनय इतना प्रभावशाली था कि दर्शकों और समीक्षकों ने उनकी तारीफ की।
इस फिल्म ने उन्हें मराठी और हिंदी दोनों फिल्म इंडस्ट्री में एक अमर स्थान दिलाया।
वी. शंतराम के साथ जीवन और संघर्ष
संध्या का जीवन सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था।
उन्होंने अपने पति वी. शंतराम के साथ कठिन समयों में भी मजबूती दिखाई।
जब वी. शंतराम आर्थिक संघर्ष से गुजर रहे थे, तब संध्या ने उनके साथ खड़ी रहकर हर मुश्किल का सामना किया।
उनकी जिंदगी अनुशासन, समर्पण और मेहनत की मिसाल थी।
संध्या न सिर्फ एक कलाकार थीं बल्कि एक सच्ची साथी भी।
sandhya shantaram का निधन 94 वर्ष की उम्र में हुआ।
उनके निधन की खबर सुनकर फिल्म जगत और प्रशंसक दुखी हो उठे।
निर्देशक मधुर भंडारकर ने सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा —
“संध्या जी जैसी कलाकार अब दुर्लभ हैं। उन्होंने भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।”
फिल्म जगत ने एक ऐसी कलाकार खो दी जिसने हर किरदार में जान डाल दी।
निष्कर्ष
sandhya shantaram का जीवन भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर की एक शानदार झलक है।
उन्होंने नारी की गरिमा, संवेदना और शक्ति को पर्दे पर ऐसे उतारा कि दर्शक हमेशा याद रखेंगे।
उनकी फिल्मों और व्यक्तित्व ने भारतीय सिनेमा में ‘कला की आत्मा’ को सजीव रखा।